New Year’s Eve 2025 Strike: दोस्तों, 31 दिसंबर की शाम… हाथ में रिमोट, नेटफ्लिक्स पर पसंदीदा मूवी और इंतज़ार उस गरमा-गरम पिज्जा या 10 मिनट में आने वाले ‘चखने’ का। लेकिन रुकिए! इस बार आपकी पार्टी का ‘Vibe’ थोड़ा बिगड़ सकता है।
भारत के डिलीवरी जांबाजों (Zomato, Swiggy, Zepto, Blinkit वाले भाई) ने ऐलान किया है कि इस बार नए साल का स्वागत वो सड़कों पर ऑर्डर पहुँचाकर नहीं, बल्कि घर बैठकर या विरोध जताकर करेंगे। जी हाँ, 31 दिसंबर को देशव्यापी हड़ताल है!
🕒 10 मिनट की डिलीवरी या ‘फास्ट एंड फ्यूरियस’ का ऑडिशन?
हम भारतीयों को सब कुछ जल्दी चाहिए। इतनी जल्दी कि कभी-कभी लगता है ऐप पर ‘Order’ बटन दबाने से पहले ही डिलीवरी वाला दरवाजे पर खड़ा मिले।
लेकिन इस ’10-Minute Delivery’ के चक्कर में हमारे डिलीवरी पार्टनर्स की हालत ‘रोहित शेट्टी’ की फिल्म के स्टंटमैन जैसी हो गई है। यूनियन का कहना है कि ये कंपनियां चाहती हैं कि डिलीवरी बॉय ट्रैफिक सिग्नल को ‘सुझाव’ समझें और गलियों में स्कूटी ऐसे उड़ाएं जैसे राकेट लॉन्च कर रहे हों।
अगर यही रफ्तार रही, तो अगली बार डिलीवरी ऐप वाले वादा करेंगे— “आर्डर बाद में देना, हम पहले ही आपके घर के बाहर खड़े हैं क्योंकि हमें अंतर्यामी होने का अपडेट मिला है!”
💸 ‘पार्टनर’ कहने से पेट नहीं भरता, साहेब!
कंपनियां इन वर्कर्स को प्यार से ‘Delivery Partner’ कहती हैं। सुनने में कितना अच्छा लगता है न? जैसे कोई बिजनेस डील हो रही हो। लेकिन हकीकत ये है कि इस ‘पार्टनरशिप’ में प्रॉफिट कंपनी का होता है और धूप, धूल, बारिश और एक्सीडेंट का रिस्क सिर्फ वर्कर का।
हड़ताल की असली वजहें (Serious Talk):
- कौड़ियों के दाम: पेट्रोल के दाम आसमान छू रहे हैं और डिलीवरी बॉय की कमाई पाताल की ओर जा रही है।
- ID ब्लॉकिंग का डर: जैसे स्कूल में टीचर बात-बात पर क्लास से बाहर निकाल देते थे, वैसे ही ये ऐप्स जरा सी गलती पर वर्कर्स की आईडी ब्लॉक कर देते हैं।
- बीमा का ‘मिस्टर इंडिया’ होना: एक्सीडेंट होने पर कंपनी ऐसे गायब हो जाती है जैसे अनिल कपूर लाल लाइट के सामने। कोई सोशल सिक्योरिटी नहीं, कोई हेल्थ कवर नहीं।
📉 न्यू ईयर पार्टी का ‘गणित’ बिगड़ने वाला है!
सोचिए, आपने दोस्तों को बुलाया है। पनीर टिक्का और कोल्ड ड्रिंक का ऑर्डर किया। ऐप पर दिखा रहा है— “Rohan is reaching your location in 45 years” (मजाक कर रहा हूँ, लेकिन हड़ताल हुई तो कुछ ऐसा ही महसूस होगा)।
- Zomato/Swiggy: “किचन बंद है” वाला मैसेज देख-देख कर आपकी भूख मर सकती है।
- Zepto/Blinkit: बर्फ और सोडा खत्म हो गया? खुद नीचे परचून की दुकान तक जाने की हिम्मत जुटा लीजिए, क्योंकि ‘क्विक कॉमर्स’ उस दिन ‘नो कॉमर्स’ मोड में होगा।
🤔 क्या समाधान है? (The Real Debate)
हड़ताल सिर्फ छुट्टी मनाने के लिए नहीं है। यह उस ‘गिग इकोनॉमी’ की कड़वी सच्चाई है जहाँ काम तो 12-14 घंटे है, लेकिन हक एक मजदूर के बराबर भी नहीं।
वर्कर्स की मांगें सिंपल हैं:
- हवा में बातें नहीं, जेब में पैसे चाहिए (Fair Pay)।
- जान की कीमत 10 मिनट के समोसे से ज्यादा होनी चाहिए।
- बीमारी या चोट लगने पर कंपनी को ‘Ghost’ नहीं करना चाहिए।
💡 प्रो-टिप: अगर आप भूखा नहीं रहना चाहते…
अगर आप भी मेरी तरह ‘आलस’ के शिकार हैं, तो 31 दिसंबर के लिए ये बैकअप प्लान तैयार रखें:
- 30 तारीख को ही राशन भर लें: मैगी और पास्ता का स्टॉक कर लो भाई, काम आएगा।
- कुकिंग स्किल्स का टेस्ट: शायद ये साल का वो दिन हो जब आपको पता चले कि गैस चूल्हा कैसे जलता है।
- धैर्य रखें: अगर कोई डिलीवरी वाला पहुँच भी जाए, तो उसे ‘Happy New Year’ के साथ एक अच्छी टिप जरूर दें। आखिर वो अपनी जान जोखिम में डालकर आपकी पार्टी बचा रहा है।
अंतिम विचार
डिलीवरी पार्टनर्स की ये हड़ताल हमें याद दिलाती है कि ‘सुविधा’ की एक मानवीय कीमत होती है। जब आप 31 की रात को जश्न मनाएं, तो सोचिएगा कि क्या 10 मिनट की बचत किसी की जिंदगी से ज्यादा कीमती है?
आपको क्या लगता है? क्या कंपनियों को ये 10-मिनट का पागलपन बंद कर देना चाहिए? नीचे कमेंट में बताएं!
