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Elon Musk की बड़ी चेतावनी: 10 साल बाद काम और पैसा, दोनों की वैल्यू Zero होगी!

कल्पना कीजिए, आप रात को बड़े चाव से अपने बिस्तर पर लेटे हैं, छत को निहार रहे हैं और मन ही मन अपनी रिटायरमेंट की प्लानिंग कर रहे हैं—“अगले 20 साल तक रोज़ाना 100 रुपये बचाऊंगा, फिर 60 की उम्र में किसी पहाड़ पर चाय की दुकान खोलकर सुकून की जिंदगी बिताऊंगा!” आपके बगल में आपकी पुरानी ‘मिट्टी की गुल्लक’ भी मुस्कुरा रही है।

​तभी, अचानक आपके फोन की स्क्रीन चमकती है और सामने एलन मस्क (Elon Musk) का एक ट्वीट आता है। मस्क साहब अपनी रॉकेट वाली कुर्सी पर बैठे बड़े प्यार से कह रहे हैं—“दोस्त, ये पैसे बचाना छोड़ दो, क्योंकि भविष्य में इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ने वाली!”

​आप चौंक कर उठ बैठते हैं! गुल्लक के हाथ-पांव फूल जाते हैं। आप सोचते हैं, “क्या मस्क भाई ने फिर से कोई नया नशा चख लिया है या उन्हें सच में कुछ ऐसा दिख रहा है जो हम साधारण इंसानों की समझ से बाहर है?”

​मस्क का तर्क सीधा और थोड़ा डरावना है: हम एक ऐसी दुनिया की ओर भाग रहे हैं जहाँ ‘इंसानी मेहनत’ की कीमत उतनी ही होगी जितनी आज पुराने नोकिया चार्जर की है—यानी Zero। मस्क का मानना है कि जल्द ही AI (Artificial Intelligence) हमारे ऑफिस की कुर्सी भी संभालेगा और हमारी फैक्ट्रियों का पसीना भी। जब रोबोट्स ही ‘मास्टर शेफ’ होंगे और रोबोट्स ही ‘डिलीवरी बॉय’, तो आप अपनी मेहनत बेचकर पैसा कैसे कमाएंगे? और जब सामान इतना सस्ता हो जाएगा कि एक नया फोन ‘समोसे’ के भाव मिलेगा, तो फिर बरसों तक पाई-पाई जोड़ने का क्या फायदा?

​तो क्या हमें सच में अपनी सारी जमा-पूँजी आज ही खर्च करके पार्टी कर लेनी चाहिए? या फिर यह एलन मस्क का कोई नया ‘इंटरस्टेलर’ मज़ाक है? चलिए, आज के इस ब्लॉग में हम इसी ‘रोबोटिक रायते’ को साफ़ करते हैं और समझते हैं कि क्या सच में आपकी रिटायरमेंट वाली गुल्लक अब सिर्फ़ एक शो-पीस बनने वाली है।

पुराना बनाम नया फॉर्मूला: जब बिरयानी से ‘इलायची’ की तरह बाहर हो जाएगा इंसान!अगर आप किसी पुराने ज़माने के अर्थशास्त्री (Economist) से पूछें कि “भाई साहब, ये अमीर बनने की रेसिपी क्या है?”, तो वो चश्मा ठीक करते हुए आपको एक भारी-भरकम नाम बताएगा— ‘Cobb-Douglas’ फंक्शन।घबराइए मत, यह किसी नई बीमारी का नाम नहीं है। यह सदियों से चला आ रहा दौलत बनाने का एक सिंपल गणित है। सदियों से दुनिया इसी पटरी पर दौड़ रही थी। चलिए, इसकी पुरानी और नई रेसिपी की तुलना करते हैं:पुरानी रेसिपी: ‘मेहनत और मशीन’ का मेलपिछले 200 सालों से अमीर बनने का फॉर्मूला कुछ ऐसा था:मशीनें (Capital) + लोग (Labor) = दौलत (Wealth)इस दौर में अगर आपको एक फैक्ट्री लगानी थी, तो आपको दो चीज़ों की ज़रूरत पड़ती थी। पहली—मशीनें (जो काम आसान करें) और दूसरा—इंसान (जो उन मशीनों को चलाएं और अपना दिमाग लगाएं)। यहाँ इंसान बहुत ज़रूरी था। बिना इंसानी ‘लेबर’ के मशीनें सिर्फ लोहे का ढेर थीं। इसलिए, आपकी और हमारी ‘वैल्यू’ थी। हम काम करते थे, हमें सैलरी मिलती थी, और उसी से इकोनॉमी का चक्का घूमता था।नई रेसिपी: जब ‘दिमाग’ का भी सॉफ्टवेयर आ गया!अब एलन मस्क और AI के उस्ताद कह रहे हैं कि यह फॉर्मूला अब एक्सपायर हो चुका है। क्यों? क्योंकि अब एंट्री हुई है AGI (Artificial General Intelligence) की।अब नया फॉर्मूला कुछ ऐसा दिख रहा है:मशीनें (Capital) + AI (Intelligence) = दौलत (Wealth)इस बदलाव में ट्विस्ट क्या है? ट्विस्ट ये है कि इस समीकरण से ‘इंसान’ (Labor) गायब हो गया है। पहले मशीनों के पास ‘हाथ-पैर’ तो थे, पर ‘दिमाग’ नहीं था। दिमाग हमारा इस्तेमाल होता था। लेकिन अब AI के पास अपना दिमाग है। वह खुद सोच सकता है, खुद को ठीक कर सकता है और खुद ही फैसले ले सकता है।दौलत की परिभाषा में ये महा-बदलाव:इंसान अब ज़रूरी नहीं रहा: मस्क का कहना है कि जैसे-जैसे AGI स्मार्ट होगी, वह फिजिकल काम (जैसे सामान उठाना) और थिंकिंग काम (जैसे कोडिंग या प्लानिंग) दोनों छीन लेगी। इंसान की ज़रूरत धीरे-धीरे ‘जीरो’ हो जाएगी।दौलत का ‘प्रिंटर’ बदल गया: पहले अमीर बनने के लिए हज़ारों मजदूरों को मैनेज करना पड़ता था। अब अमीर बनने के लिए सिर्फ हज़ारों रोबोट्स और एक सॉलिड AI सर्वर चाहिए।वैल्यू का गिरना: जब काम करने वाला कोई ‘इंसान’ बचेगा ही नहीं, तो आपकी ‘मेहनत’ की कीमत मार्केट में वैसी ही होगी जैसी आज ‘पुरानी रद्दी’ की है।सीधी बात ये है: पुराने ज़माने में दौलत का मतलब था ‘इंसान और मशीन का साथ’। नए ज़माने में दौलत का मतलब है ‘मशीनों का मशीनों के साथ तालमेल’।

पुराना बनाम नया फॉर्मूला: जब बिरयानी से ‘इलायची’ की तरह बाहर हो जाएगा इंसान!

​अगर आप किसी पुराने ज़माने के अर्थशास्त्री (Economist) से पूछें कि “भाई साहब, ये अमीर बनने की रेसिपी क्या है?”, तो वो चश्मा ठीक करते हुए आपको एक भारी-भरकम नाम बताएगा— ‘Cobb-Douglas’ फंक्शन

​घबराइए मत, यह किसी नई बीमारी का नाम नहीं है। यह सदियों से चला आ रहा दौलत बनाने का एक सिंपल गणित है। सदियों से दुनिया इसी पटरी पर दौड़ रही थी। चलिए, इसकी पुरानी और नई रेसिपी की तुलना करते हैं:

पुरानी रेसिपी: ‘मेहनत और मशीन’ का मेल

​पिछले 200 सालों से अमीर बनने का फॉर्मूला कुछ ऐसा था:

मशीनें (Capital) + लोग (Labor) = दौलत (Wealth)

​इस दौर में अगर आपको एक फैक्ट्री लगानी थी, तो आपको दो चीज़ों की ज़रूरत पड़ती थी। पहली—मशीनें (जो काम आसान करें) और दूसरा—इंसान (जो उन मशीनों को चलाएं और अपना दिमाग लगाएं)। यहाँ इंसान बहुत ज़रूरी था। बिना इंसानी ‘लेबर’ के मशीनें सिर्फ लोहे का ढेर थीं। इसलिए, आपकी और हमारी ‘वैल्यू’ थी। हम काम करते थे, हमें सैलरी मिलती थी, और उसी से इकोनॉमी का चक्का घूमता था।

नई रेसिपी: जब ‘दिमाग’ का भी सॉफ्टवेयर आ गया!

​अब एलन मस्क और AI के उस्ताद कह रहे हैं कि यह फॉर्मूला अब एक्सपायर हो चुका है। क्यों? क्योंकि अब एंट्री हुई है AGI (Artificial General Intelligence) की।

​अब नया फॉर्मूला कुछ ऐसा दिख रहा है:

मशीनें (Capital) + AI (Intelligence) = दौलत (Wealth)

इस बदलाव में ट्विस्ट क्या है? ट्विस्ट ये है कि इस समीकरण से ‘इंसान’ (Labor) गायब हो गया है। पहले मशीनों के पास ‘हाथ-पैर’ तो थे, पर ‘दिमाग’ नहीं था। दिमाग हमारा इस्तेमाल होता था। लेकिन अब AI के पास अपना दिमाग है। वह खुद सोच सकता है, खुद को ठीक कर सकता है और खुद ही फैसले ले सकता है।

दौलत की परिभाषा में ये महा-बदलाव:

  1. इंसान अब ज़रूरी नहीं रहा: मस्क का कहना है कि जैसे-जैसे AGI स्मार्ट होगी, वह फिजिकल काम (जैसे सामान उठाना) और थिंकिंग काम (जैसे कोडिंग या प्लानिंग) दोनों छीन लेगी। इंसान की ज़रूरत धीरे-धीरे ‘जीरो’ हो जाएगी।
  2. दौलत का ‘प्रिंटर’ बदल गया: पहले अमीर बनने के लिए हज़ारों मजदूरों को मैनेज करना पड़ता था। अब अमीर बनने के लिए सिर्फ हज़ारों रोबोट्स और एक सॉलिड AI सर्वर चाहिए।
  3. वैल्यू का गिरना: जब काम करने वाला कोई ‘इंसान’ बचेगा ही नहीं, तो आपकी ‘मेहनत’ की कीमत मार्केट में वैसी ही होगी जैसी आज ‘पुरानी रद्दी’ की है।

सीधी बात ये है: पुराने ज़माने में दौलत का मतलब था ‘इंसान और मशीन का साथ’। नए ज़माने में दौलत का मतलब है ‘मशीनों का मशीनों के साथ तालमेल’।

AGI: दुनिया का सबसे ताकतवर मजदूर (The Ultimate Worker)

​अगर मैं आपसे कहूँ कि एक ऐसा मजदूर है जो कभी सोता नहीं, जिसे कभी ‘ब्रेकअप’ का गम नहीं सताता और जो कभी सैलरी बढ़ाने के लिए स्ट्राइक पर नहीं जाता… तो आप शायद कहेंगे, “भाई, ये तो किसी जन्नत का सपना है!” लेकिन एलन मस्क के लिए यह जन्नत नहीं, बल्कि AGI (Artificial General Intelligence) की हकीकत है।

ये कोई आम रोबोट नहीं है!

​आज के रोबोट्स को देखिए, वे सिर्फ वही करते हैं जो उन्हें सिखाया जाता है। लेकिन AGI? यह तो ‘मल्टी-टैलेंटेड’ शर्मा जी का वो लड़का है जो कोडिंग भी कर सकता है, भारी वजन भी उठा सकता है, कंपनी की स्ट्रेटेजी भी बना सकता है और शायद आपकी बोरियत दूर करने के लिए जोक्स भी सुना सकता है।

क्यों है ये सबसे ‘खतरनाक’ मजदूर?

  1. 24/7/365 वर्किंग मोड: हमें 8 घंटे की नींद चाहिए, वरना हमारा दिमाग ‘हैंग’ होने लगता है। AGI को सिर्फ बिजली चाहिए। यह रात के 3 बजे भी उतनी ही फुर्ती से काम करेगा जितना दोपहर के 3 बजे। इसमें न आलस है, न ‘मंडे ब्लूज़’।
  2. 5x उत्पादकता (Productivity): इंसानों में थकने की और गलतियाँ करने की प्रवृत्ति होती है। लेकिन ये रोबोट्स इंसानों के मुकाबले 5 गुना ज्यादा तेजी से और बिना किसी गलती के काम कर सकते हैं। यानी जहाँ एक काम के लिए 5 लोगों की जरूरत थी, अब वहां सिर्फ एक रोबोट काफी है।
  3. सिर्फ काम नहीं, ‘सोच’ भी: सबसे बड़ा बदलाव यह है कि ये सिर्फ फिजिकल काम नहीं कर रहे। ये ‘दिमाग’ वाले काम भी कर रहे हैं। आज जिसे हम ‘सफेदपोश’ (White-collar) नौकरी कहते हैं—जैसे अकाउंटिंग, लॉजिक या मैनेजमेंट—AGI उसे चुटकियों में कर लेगा।

बड़ा बदलाव: जब मजदूर ही ‘पूंजी’ बन जाए

​आज के दौर में इंसान ‘मजदूर’ (Labor) है। हम अपनी मेहनत बेचते हैं और पैसे कमाते हैं। लेकिन कल के इस AI युग में, ये रोबोट्स खुद ‘पूंजी’ (Capital) बन जाएंगे।

​इसका मतलब समझिए—आज आप एक कर्मचारी को ‘किराये’ पर रखते हैं, लेकिन कल मालिक इन रोबोट्स को ‘खरीद’ लेगा। एक बार पैसा लगाया और फिर जिंदगी भर के लिए एक ऐसा मजदूर मिल गया जो फ्री में दौलत छाप कर देगा।

कड़वा सच: एलन मस्क की स्लाइड्स साफ़ कहती हैं—कल के मालिक इंसानों को सैलरी देने के बजाय रोबोट्स खरीदना पसंद करेंगे। क्योंकि रोबोट्स सिर्फ काम नहीं करते, वे अपने मालिक के लिए “दौलत छापने वाली मशीन” बन जाते हैं।

Post-Scarcity: जब हर चीज़ मुफ्त के बराबर होगी (Imagine a World Without Price Tags)

​अभी हम जिस दुनिया में रहते हैं, उसका सबसे बड़ा सच है—कमी (Scarcity)। “अच्छे घर कम हैं, इसलिए महंगे हैं। नया आईफोन कम है, इसलिए उसकी कीमत लाखों में है।” लेकिन एलन मस्क जिस भविष्य की बात कर रहे हैं, उसे कहते हैं ‘Post-Scarcity’ यानी एक ऐसी दुनिया जहाँ किसी चीज़ की कमी ही नहीं होगी।

ये ‘मुफ्त’ का जादू काम कैसे करेगा?

​सोचिए, किसी भी चीज़ की कीमत क्यों होती है? क्योंकि उसे बनाने में इंसानी मेहनत, कच्चा माल और ट्रांसपोर्टेशन का खर्चा लगता है। अब इस सीन को बदल दीजिए:

  • मशीनें ही खदानों से लोहा निकाल रही हैं।
  • मशीनें ही बिजली पैदा कर रही हैं।
  • मशीनें ही फैक्ट्री में सामान जोड़ रही हैं।
  • और खुद से चलने वाले ट्रक (Self-driving trucks) उसे आपके घर तक पहुँचा रहे हैं।

​जब इस पूरी चैन में किसी इंसान को ‘सैलरी’ देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी, तो सामान बनाने का खर्चा लगभग Zero हो जाएगा। मस्क का कहना है कि अगर एक आईफोन बनाने की लागत कंपनी को सिर्फ कुछ पैसे पड़ेगी, तो वह आपके लिए लगभग मुफ्त जैसा ही होगा।

क्या होगा जब ‘प्राइस टैग’ गायब हो जाएंगे?

  1. पैसा बचाने की टेंशन खत्म: आज हम 10 साल की ईएमआई (EMI) पर घर या कार लेते हैं। लेकिन उस दुनिया में, रोबोट्स इतनी तेज़ी और इतनी मात्रा में सामान बनाएंगे कि ‘वेटिंग लिस्ट’ जैसी कोई चीज़ नहीं होगी।
  2. सबके लिए सब कुछ: एलन मस्क इसे “यूनिवर्सल हाई इनकम” (Universal High Income) कहते हैं। उनका मानना है कि भविष्य में गरीबी इसलिए खत्म नहीं होगी कि सबके पास बैंक बैलेंस होगा, बल्कि इसलिए खत्म होगी क्योंकि जीने के लिए ज़रूरी सामान (रोटी, कपड़ा, मकान और गैजेट्स) सबके लिए उपलब्ध होंगे।
  3. ज़रूरत बनाम ख्वाहिश: जब हर चीज़ ‘पेंस’ (पैसे) के भाव मिलेगी, तो अमीर और गरीब के बीच का फर्क कम होने लगेगा। आप आईफोन इसलिए नहीं खरीदेंगे कि आपको दिखावा करना है, बल्कि इसलिए क्योंकि वह हर किसी के पास मौजूद एक आम चीज़ होगी।

पर क्या वाकई सब कुछ इतना ‘गुलाबी’ होगा?

​यहीं पर मस्क एक चेतावनी भी देते हैं। अगर चीज़ें मुफ्त हैं, तो ठीक है। लेकिन अगर आपको उन्हें खरीदने के लिए फिर भी थोड़े पैसों की ज़रूरत है, और आपके पास नौकरी नहीं है, तो आप क्या करेंगे? यहीं से शुरू होता है ‘The Zero Wage Trap’

महंगाई का जाल और बचत का जोखिम (The Inflation Trap)

​जब एलन मस्क कहते हैं कि “पैसे बचाना छोड़ दो”, तो वो आपको शॉपिंग पर जाने के लिए नहीं कह रहे, बल्कि वो आपको एक गहरे आर्थिक जाल से सावधान कर रहे हैं जिसे ‘इन्फ्लेशन ट्रैप’ कहा जाता है।

पैसे की वैल्यू बनाम चीज़ों की वैल्यू

​आम तौर पर हम सोचते हैं कि अगर हमारे बैंक में 10 लाख रुपये हैं, तो हम अमीर हैं। लेकिन मस्क हमें ‘Nominal’ (जो दिखता है) और ‘Real’ (जो असल में है) के बीच का फर्क समझा रहे हैं।

​सोचिए, आज आपने ₹10 लाख बचाए। लेकिन कल AI की वजह से पूरी दुनिया की इकोनॉमी बदल गई। अचानक नई तकनीकों की बाढ़ आ गई और पुरानी चीज़ें बेकार हो गईं। अगर उस नई दुनिया में आपके ₹10 लाख की क्रय शक्ति (Buying Power) गिर गई, तो वो पैसा सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाएगा।

मस्क की ‘Don’t Save’ थ्योरी के पीछे 3 बड़े कारण:

  1. कैश बनाम एसेट्स (Assets): इतिहास गवाह है कि जब भी अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव या महंगाई आती है, तो कैश (नकद) की वैल्यू घटती है, लेकिन ‘एसेट्स’ (जैसे स्टॉक्स, जमीन या तकनीक) की वैल्यू बढ़ती है। मस्क का इशारा साफ है—कैश पकड़कर मत बैठो, बल्कि भविष्य की तकनीक और संपत्तियों में निवेश करो।
  2. शून्य मजदूरी का खतरा (The Zero Wage Trap): स्लाइड्स में एक ग्राफ है जो दिखाता है कि जैसे-जैसे AI का हिस्सा बढ़ेगा, इंसानी मजदूरी नीचे गिरेगी। अगर आपकी आमदनी का जरिया (नौकरी) खत्म हो रहा है, तो आपके पास मौजूद ‘बचत’ कितने दिन चलेगी?
  3. इकोनॉमी का ‘फ्रीज’ होना: यहाँ एक बड़ा विरोधाभास (Paradox) है। फैक्ट्रियां लाखों सस्ते सामान बनाएंगी, लेकिन अगर नौकरी न होने की वजह से किसी की जेब में पैसा ही नहीं होगा, तो कोई खरीदेगा क्या? ऐसी स्थिति में पुराने पैसे की वैल्यू पूरी तरह खत्म हो सकती है और सरकार को ‘नया सिस्टम’ लागू करना पड़ सकता है।

holding cash is the riskiest move!

​मस्क के मुताबिक, एक तेजी से बदलती AI दुनिया में नकद बचाना सबसे जोखिम भरा काम है। क्योंकि जिस रफ्तार से रोबोट्स और इंटेलिजेंस दुनिया को बदलेंगे, आपका आज का ‘बड़ा पैसा’ कल की ‘चिल्लर’ बन सकता है।

Techno-Kings: क्या हम एक नई गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं? (The Rise of the Techno-Kings)

​अगर हम एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ काम करने के लिए ‘इंसान’ की ज़रूरत नहीं है, तो एक बहुत ही चुभता हुआ सवाल सामने आता है—“सारा पैसा जाएगा किसके पास?” मस्क की स्लाइड्स इस कड़वे सच की ओर इशारा करती हैं: एक ऐसी दुनिया जहाँ पैसा सिर्फ उनके पास बहेगा जो रोबोट्स के मालिक होंगे। इसे ही कहते हैं ‘टेक्नो-किंग्स’ का उदय।

आज की हकीकत, कल का डर

​जरा आज के आंकड़ों पर गौर कीजिए। एलन मस्क की अकेले की दौलत (लगभग 749 बिलियन डॉलर) भारत की चार सबसे बड़ी कंपनियों—Reliance, HDFC, Airtel और TCS—की कुल वैल्यू से भी ज़्यादा है। अब सोचिए, जब भविष्य में मस्क के पास लाखों रोबोट्स की फौज होगी, जो बिना रुके दौलत पैदा करेंगे, तो यह फासला कितना बढ़ जाएगा?

एक नई तरह की ‘राजशाही’ (Technological Aristocracy)

​हम एक ऐसे जाल में फंस सकते हैं जिसे “टेक्नोलॉजिकल एरिस्टोक्रेसी” कहा जाता है:

  • मुट्ठी भर ट्रिलियनेयर: दुनिया के कुछ गिने-चुने लोग होंगे जिनके पास AI सॉफ्टवेयर और रोबोटिक फैक्ट्रियों का कंट्रोल होगा।
  • आर्थिक रूप से मूल्यहीन आबादी: अरबों लोग ऐसे होंगे जिनके पास देने के लिए कोई ‘इकोनॉमिक वैल्यू’ (आर्थिक मूल्य) नहीं होगी क्योंकि उनका काम रोबोट्स पहले से ही बेहतर कर रहे होंगे।

खतरा क्या है?

​जब इंसान की मेहनत की कोई कीमत नहीं रहेगी, तो आम आदमी की ‘बार्गेनिंग पावर’ यानी मोलभाव करने की शक्ति खत्म हो जाएगी। पहले मजदूर स्ट्राइक करके अपनी बात मनवा सकते थे, लेकिन रोबोट्स के दौर में आप किससे शिकायत करेंगे? यदि सिस्टम नहीं बदला, तो हम एक ऐसी दुनिया में होंगे जहाँ उत्पादन तो ‘असीमित’ होगा, लेकिन उसका कंट्रोल सिर्फ कुछ ‘टेक्नो-किंग्स’ के हाथों में होगा।

क्या हमें सच में डरना चाहिए? (Rewriting the Social Contract)

​तो क्या इसका मतलब है कि भविष्य बहुत डरावना है? ज़रूरी नहीं। दार्शनिक जीन-जैक्स रूसो ने सालों पहले एक ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ (सामाजिक समझौता) की बात की थी—कि हम काम करेंगे, टैक्स देंगे और बदले में समाज हमें सुरक्षा देगा।

​लेकिन जब ‘काम’ ही गायब हो जाएगा, तो यह समझौता टूट जाएगा। मस्क और अन्य विचारकों का मानना है कि हमें “Universal High Income” की ज़रूरत होगी। यानी रोबोट्स जो दौलत पैदा करेंगे, उसका एक हिस्सा हर नागरिक को मिलना चाहिए ताकि समाज का संतुलन बना रहे।

भविष्य में आपकी सबसे बड़ी संपत्ति आपकी ‘बचत’ (Savings) नहीं, बल्कि आपकी ‘अनुकूलन क्षमता’ (Adaptability) होगी। पुरानी दुनिया के नियम (मेहनत, बचत, रिटायरमेंट) बदल रहे हैं। अब समय है तकनीक को समझने का, नई संपत्तियों (Assets) में निवेश करने का और एक ऐसी दुनिया के लिए तैयार होने का जहाँ इंसान की पहचान उसके ‘काम’ से नहीं, बल्कि उसकी ‘क्रिएटिविटी’ और ‘विचारों’ से होगी।

क्या आपको लगता है कि रोबोट्स की यह दुनिया हमारे लिए वरदान होगी या अभिशाप? अपनी राय नीचे कमेंट्स में ज़रूर लिखें!

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