How ETFs Issuers Make Money ? ETF वाले अमीर कैसे बनते हैं? “मुफ्त की सलाह” से “करोड़ों के साम्राज्य” तक का सफर!

ETF Issuers Money Secrets
फाइनेंस की दुनिया

🕵️‍♂️ ETF वाले अमीर कैसे बनते हैं?

मुफ्त की सलाह से लेकर करोड़ों के साम्राज्य तक का मजेदार सच!

नमस्ते इन्वेस्टर्स! अगर आप इस ब्लॉग पर आए हैं, तो या तो आप शेयर बाजार के दीवाने हैं, या फिर गलती से ‘How to make money fast’ सर्च कर लिया है। खैर, जो भी हो, आज हम उन ‘मास्टरमाइंड्स’ का पर्दाफाश करेंगे जो आपको ETF बेचकर अपनी प्राइवेट जेट की किश्तें भर रहे हैं।

🚨 चेतावनी: यह ब्लॉग पढ़ने के बाद आपको अपने फंड मैनेजर की चमकती घड़ी से जलन हो सकती है!

1. एक्सपेंस रेशियो: “चुटकी भर सिंदूर” की कीमत! 💄

शुरुआत करते हैं सबसे पुराने और वफादार तरीके से—Expense Ratio

ये कंपनियां आपसे ₹5000 की फीस नहीं मांगतीं। वो कहती हैं, “बस 0.05% दे दीजिए।” सुनने में ये इतना छोटा लगता है जैसे आपके ₹100 के समोसे में से किसी ने एक दाना धनिया उठा लिया हो।

गणित का खेल: जब ₹1,00,000 करोड़ का फंड मैनेज हो रहा हो, तो ये ‘धनिया’ इतना बड़ा हो जाता है कि उससे पूरा का पूरा खेत खरीदा जा सकता है।

2. सिक्योरिटीज लेंडिंग: “किरायेदार का खेल” 🏠

क्या आपने सोचा है कि आपके पोर्टफोलियो में रखे शेयर्स रात को क्या करते हैं? वो सोते नहीं हैं! ETF कंपनियां आपके शेयर्स को Short Sellers को उधार दे देती हैं।

  • कैसे काम करता है? आपके पास रिलायंस के शेयर्स हैं, Issuer उसे किसी ट्रेडर को उधार देगा।
  • कमाई: मोटा ब्याज! शेयर आपका, रिस्क आपका, लेकिन ‘किराया’ मैनेजर का।

3. “क्रिएशन और रिडेम्पशन” का जादुई झूला 🎡

ETF यूनिट्स को बनाने और मिटाने की एक प्रक्रिया होती है। इसमें Authorized Participants (APs) शामिल होते हैं। जब भी नए यूनिट्स बनते हैं, Issuer इन बड़े खिलाड़ियों से ‘प्रोसेसिंग फीस’ वसूलता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे हलवाई मैदा लाने वाले से भी पैसे ले और समोसा खाने वाले से भी!

📊 कमाई का रिपोर्ट कार्ड

तरीका कॉमेडी लेवल असली कमाई
Expense Ratio चाय का खर्चा अरबों की पक्की कमाई
Stock Lending पड़ोसी की साइकिल लो-रिस्क, हाई-प्रॉफिट
Index Licensing नाम ही काफी है ब्रांड रॉयल्टी

4. सॉफ्ट डॉलर्स (Soft Dollars): अदृश्य कमाई 🕶️

फंड मैनेजर्स अक्सर खास ब्रोकर्स के जरिए ही ट्रेडिंग करते हैं। बदले में, वो ब्रोकर्स उन्हें फ्री रिसर्च, सॉफ्टवेयर या ‘खास सेवाएं’ देते हैं। पैसे आपके, ट्रेडिंग आपकी, लेकिन ‘फ्री सॉफ्टवेयर’ मैनेजर का। इसे कहते हैं “दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर शिकार करना”!

निष्कर्ष: भले ही ये कंपनियां अमीर बन रही हैं, लेकिन उन्होंने इन्वेस्टिंग को इतना आसान बना दिया है कि अब एक कॉलेज का बच्चा भी ‘निफ्टी 50’ का मालिक बन सकता है।
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